बदला है इंसान इस दौर का बदला है माहौल इस दौर का

बदला है इंसान इस दौर का बदला है माहौल इस दौर का 

पहली की तरह बरसात में अब मिट्टी की खुश्बू नही आती 

परिंदो की वो प्यारी चहक अब सुनाई नही देती

बसंत ऋतु में अब वो हरियाली अब दिखाई नही देती

बचपन की मस्ती भरी शरारतें अब दिखाई नही देती

यूं मसरूफ हैं हम अपने आप मे हमें दूसरे की अच्छाई दिखाई नहीं देती

यू तो हँसते अभी भी है सब पर   अब किसी से चेहरे पे दिल से निकलने  वाली मुस्कान दिखाई नही देती

बढ़ती जा रही है नजदीकियां खुद से  अब इतनी की किसी के दिल मे किसी और के लिए बची जगह दिखाई नही देती

बढ़ते चलते जा रहे है अकेल सभीे आगे किसी को साथ ले के चलने की चाहत दिखाई नही देती

हम  बदलते रहे  फ़ोन को न जाने कब हमे बदल दिया फ़ोन ने 

जितने बड़े हमारे फ़ोन होते जा रहे है उतने छोटे हमारे दिल होते जा रहे है

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5 thoughts on “बदला है इंसान इस दौर का बदला है माहौल इस दौर का”

  1. कमाल है ना आँखे तालाब नहीं फिर भी भर जाती है , और इंसान मौसम नहीं फिर भी बदल जाता है!….

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  2. शौंक नहीं है मुझे अपने जज़्बातों को यूँ सरेआम लिखने का …
    मगर क्या करूँ , अब जरिया ही ये है तुझसे बात करने का ..

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